मेरी संन्यास यात्रा: गुरुकुल के वे धन्य क्षण
गर्मियों की एक ठंडी और सुहावनी सुबह मैं वहां पहुँचा। ऊटी से 5 किलोमीटर ऊपर 'फर्नहिल' में स्थित गुरुकुल अत्यंत शांत और एकांत लग रहा था। मेरा मन एक सुंदर मौन में डूबा हुआ था। जीवन के उस महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े होकर मुझे अगाध आत्मविश्वास और शांति का अनुभव हो रहा था। बचपन से ही मेरे मन में भगवा वस्त्रधारी संन्यासियों के प्रति गहरा सम्मान था। पर तब मुझे यह आभास नहीं था कि मैं भी उन्हीं में से एक बनने जा रहा हूँ। जब मैंने अपने माता-पिता से कहा कि मैं गुरु नित्य चैतन्य यति से संन्यास की दीक्षा लेने जा रहा हूँ, तो उन्होंने खुशी-खुशी "ठीक है" कह दिया; क्योंकि उन्हें विश्वास ही नहीं था कि 23 साल की इस अल्पायु में मैं संन्यासी बन पाऊँगा।
जब मुझे गुरुजी के साथ व्यक्तिगत संवाद का अवसर मिला, तो मैंने अपने हृदय की इच्छा उनके सामने रख दी। उन्होंने बस इतना कहा, "अच्छा"। फिर जब मैंने उनसे ही दीक्षा लेने की इच्छा जताई, तो मैंने उनकी आँखों में एक आंतरिक मुस्कान देखी। बिना किसी सहमति या असहमति के, उन्होंने मुझे अपनी संन्यास दीक्षा की कहानी सुनानी शुरू की। उस समय उनकी आयु लगभग 18 या 20 वर्ष रही होगी। रमण महर्षि के बारे में सुनकर वे घर छोड़कर तिरुवन्नामलई पहुँच गए थे। महर्षि उस समय मौन में थे और वृद्ध हो चुके थे। लोग उस संत को प्रणाम करने के लिए कतार में खड़े थे। महर्षि अपनी आँखें बंद किए मौन बैठे थे। गुरुजी ने बताया कि उस कतार में खड़े होकर उन्हें अपने हृदय की धड़कनें साफ सुनाई दे रही थीं। 'कैसे पूछूँ? क्या रमण आँखें खोलकर बात करेंगे? क्या मुझे संन्यास के लिए पूछना चाहिए?'—ये सभी प्रश्न उनके मन में कौंध रहे थे। जब उनकी बारी आई, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा; रमण महर्षि ने आँखें खोलीं और सीधे उनकी आँखों में देखा। गुरुजी ने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई बिजली की तरंग उनकी ओर प्रवाहित हुई हो। इस अनुभव को सुनाने के बाद, गुरुजी ने मुझसे कहा: "संन्यास कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे दिया या लिया जा सके। यह मन की एक अवस्था है और साथ ही एक जीवनशैली भी है।"
गुरुजी के शब्दों ने मुझे बहुत प्रेरित किया। मुझे वे बहुत व्यावहारिक लगे और मन में यह भाव बैठ गया कि वही मेरे गुरु हैं। मैं एक शुभ दीक्षा समारोह की प्रतीक्षा में धैर्यपूर्वक गुरुकुल में ही रुक गया। लेकिन ऐसा लगा जैसे गुरुजी उस पूरी बात को ही भूल गए हों। अंत में जब मैंने उम्मीद छोड़ दी, तब एक दिन अपनी उपनिषद की कक्षा के दौरान गुरुजी ने 'श्री नारायण गुरु' का 'होम मंत्र' पढ़ा और उसका सूक्ष्म अर्थ समझाया। गुरुकुल में दीक्षा समारोहों के दौरान इसी मंत्र का जाप किया जाता था। गुरुजी चाहते थे कि मैं उनके पीछे-पीछे इस मंत्र को दोहराऊँ। मैं समझ गया कि यह मेरी संन्यास दीक्षा का पहला कदम था। वहां कोई यज्ञ की अग्नि या कर्मकांड नहीं थे; सब कुछ आंतरिक जगत में घटित हुआ।
एक बार गुरुजी ने मुझे 'आनंद नाद योगी' कहकर पुकारा, और मैं जान गया कि यही मेरा संन्यास का नाम है। फिर कई दिन बीत गए और एक शाम नियमित कक्षा के बाद, गुरुजी ने मुझे अपने पास बुलाया—तब जब मुझे इसकी रत्ती भर भी उम्मीद नहीं थी। जब मैं उनके पैर छूकर उनके पास बैठा, तो गुरुजी ने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा। मुझे अपने भीतर ऊर्जा के एक जबरदस्त प्रवाह का अनुभव हुआ और एक सुनहरी आभा ने हम दोनों को घेर लिया। काफी देर तक मेरे हृदय में एक भारीपन सा महसूस होता रहा। उस अवस्था को शब्दों में बयान करना अत्यंत कठिन है। फिर उन्होंने मुझे भगवा वस्त्र ओढ़ाए और संन्यास के बारे में बहुत सी बातें समझाईं। उस पूरी रात मैं सो नहीं सका। मैं एक परमानंद की स्थिति में था। अगला दिन मेरा जन्मदिन था। वास्तव में संन्यास एक नया जन्म ही है, और यह मेरे जन्मदिन पर मेरे गुरु की ओर से मिला एक अमूल्य उपहार बन गया।

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